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रामायन श्री लंका हिस्ट्री

 आज भी लंका में मौजूद है भगवान श्री राम और रावण के बीच हुवे युद्ध और हनुमान जी के लंका जलाने के प्रमाण   (श्रीलंका का इंटरनेशनल रामायण रिसर्च सेंटर और वहां के पर्यटन मंत्रालय )-- आज भी मौजूद है "लंका" में रावण के महल, मन्दिर और  गुफाएं, आज भी लंका में "रामायणकालीन" स्थल मौजूद है । दशहरा  अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान श्री राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। 

रामायन श्री लंका हिस्ट्री

श्रीलंका का इंटरनेशनल रामायण रिसर्च सेंटर और वहां के पर्यटन मंत्रालय ने मिलकर रामायण से जुड़े ऐसे 50 स्थल ढूंढ लिए हैं जिनका "पुरातात्विक" और ऐतिहासिक महत्व है और जिनका रामायण में भी उल्लेख मिलता है। श्रीलंका में वह स्थान ढूंढ लिया गया है, जहां रावण की सोने की लंका थी। अशोक वाटिका, राम-रावण युद्ध भूमि, रावण की गुफा, रावण के हवाई अड्डे, रावण का शव, रावण का महल और ऐसे 50 रामायणकालीन स्थलों की खोज करने का दावा ‍किया गया है। बाकायदा इसके सबूत भी पेश किए गए हैं।कमेटी के अध्यक्ष अशोक केंथ का कहना है कि रामायण में वर्णित लंका वास्तव में श्री लंका ही है जहां उसानगोडा , गुरुलोपोथा, तोतुपोलाकंदा तथा वरियापोला नामक चार हवाईअड्डे मिले हैं.

 

वाल्मीकि रामायण में लंका को समुद्र के पार द्वीप के मध्य में स्थित बताया गया है अर्थात आज की श्रीलंका के मध्य में रावण की लंका स्थित थी। श्रीलंका के संस्कृत एवं पाली साहित्य का प्राचीनकाल से ही भारत से घनिष्ठ संबंध था। भारतीय महाकाव्यों की परंपरा पर आधारित 'जानकी हरण' के रचनाकार कुमार दास के संबंध में कहा जाता है कि वे महाकवि कालिदास के अनन्य मित्र थे। कुमार दास (512-21ई.) लंका के राजा थे। इसे पहले 700 ईसापूर्व श्रीलंका में 'मलेराज की कथा' की कथा सिंहली भाषा में जन-जन में प्रचलित रही, जो राम के जीवन से जुड़ी है। 


अंतरिक्ष एजेंसी नासा का प्लेनेटेरियम सॉफ्टवेयर रामायणकालीन हर घटना की गणना कर सकता है। इसमें राम को वनवास हो, राम-रावण युद्ध हो या फिर अन्य कोई घटनाक्रम। इस सॉफ्टवेयर की गणना बताती है कि ईसा पूर्व 5076 साल पहले राम ने रावण का संहार किया था।


श्री रामायण रिसर्च कमेटी : वर्ष 2004 में पंजाब के बांगा इलाके के रहने वाले अशोक कैंथ श्रीलंका में अशोक वाटिका की खोज की सुर्खियां में आया था। श्रीलंका सरकार ने 2007 में रिसर्च कमेटी का गठन किया।

 

कमेटी में श्रीलंका के पर्यटन मंत्रालय के डायरेक्टर जनरल क्लाइव सिलवम, ऑस्ट्रेलिया के डेरिक बाक्सी, श्रीलंका के पीवाई सुंदरेशम, जर्मनी की उर्सला मुलर, इंग्लैंड की हिमी जायज शामिल हैं। अब तक कमेटी ने श्रीलंका में रावण के महल, विभीषण महल, श्रीगुरु नानक के लंका प्रवास पर रिसर्च की है। 


#रामसेतु


रामसेतु जिसे अंग्रेजी में एडम्स ब्रिज भी कहा जाता है, भारत के दक्षिण पूर्वी तट के किनारे रामेश्वरम द्वीप तथा श्रीलंका के उत्तर पश्चिमी तट पर मन्नार द्वीप के मध्य चूना पत्थर से बनी एक श्रृंखला है. भौगोलिक प्रमाणों से पता चलता है कि किसी समय यह सेतु भारत तथा श्रीलंका को भू-मार्ग से आपस में जोड़ता था. यह पुल करीब 18 मील (30 किलोमीटर) लंबा है.


वेरांगटोक : महियांगना मध्य, श्रीलंका स्थित नुवारा एलिया का एक पर्वतीय क्षेत्र, जो वेरांगटोक (जो महियांगना से 10 किलोमीटर दूर है) में है, को रावण के हवाई अड्डे का क्षेत्र कहा जाता है। यहीं पर रावण ने सीता का हरण कर पुष्पक विमान को उतारा था।वैलाव्या और ऐला के बीच 17 मील लंबे मार्ग पर रावण से जुड़े अवशेष अब भी मौजूद हैं। श्रीलंका की श्री रामायण रिसर्च कमेटी के अनुसार रावण के 4 हवाई अड्डे थे। उनके 4 हवाई अड्डे ये हैं- उसानगोड़ा, गुरुलोपोथा, तोतूपोलाकंदा और वारियापोला। इन 4 में से एक उसानगोड़ा हवाई अड्डा नष्ट हो गया था। कमेटी के अनुसार सीता की तलाश में जब हनुमान लंका पहुंचे तो लंका दहन में रावण का उसानगोड़ा हवाई अड्डा नष्ट हो गया था।


सीता एलिया :  सीता एलिया श्री लंका में स्थित वह स्थान है जहां रावण ने माता सीता को बंदी बना कर रखा था। माता सीता को सीता एलिया में एक वाटिका में रखा गया था जिसे अशोक वाटिका कहते हैं। वेरांगटोक से सीता माता को जहां ले जाया गया था उस स्थान का नाम गुरुलपोटा है जिसे अब 'सीतोकोटुवा' नाम से जाना जाता है। यह स्थान भी महियांगना के पास है। एलिया पर्वतीय क्षेत्र की एक गुफा में सीता माता को रखा गया था जिसे 'सीता एलिया' नाम से जाना जाता है। यहां सीता माता के नाम पर एक मंदिर भी है। यह मंदिर सीता अम्मन कोविले नाम से प्रसिद्ध है।सीता एलिया में रावण की भतीजी त्रिजटा, जो सीता की देखभाल के लिए रखी गई थी, के साथ सीता को रखा गया था।


रावण का महल : श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है


सीता एलिया में स्थित अशोक वाटिका से कुछ दूर ही रावण का महल स्थित था। कहा जाता है कि लंकापति रावण के महल, जिसमें वह अपनी पटरानी मंदोदरी के साथ निवास करता था, के अब भी अवशेष मौजूद हैं। इस महल को पवनपुत्र हनुमान ने लंका के साथ जला दिया था। यह जला हुआ महल आज भी मौजूद है।

 

'रावण एल्ला' नाम से एक झरना है, जो एक अंडाकार चट्टान से लगभग 25 मीटर अर्थात 82 फुट की ऊंचाई से गिरता है। 'रावण एल्ला' वॉटर फॉल घने जंगलों के बीच स्थित है। यहां 'सीता' नाम से एक पुल भी है। इसी क्षेत्र में रावण की एक गुफा भी है जिसे 'रावण एल्ला' गुफा के नाम से जाना जाता है। यह गुफा समुद्र की सतह से 1,370 मी. की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान श्रीलंका के बांद्रावेला से 11 किलोमीटर दूर है।

 

लोरानी सेनारत्ने, जो लंबे समय तक श्रीलंका के इतिहास और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से संबंधित रही हैं और श्रीलंका की इटली में राजदूत भी रह चुकी हैं, ने अपनी पुस्तक 'हेअरस टू हिस्ट्री' में पहले 2 भाग रावण पर ही लिखे हैं। उनके अनुसार रावण 4,000 वर्ष ईसा पूर्व हुआ था। रावण चमकते हुए दरवाजे वाले 900 कमरों के महल में निवास करता था।


श्रीलंका के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ 'महावंसा' में मातले के पास लंकापुरा का नाम आता है। रावण के शासनकाल में यह नगर बहुत महत्वपूर्ण था। ईसा पूर्व 2,387 में रावण की मृत्यु के तुरंत बाद लंका का कुछ अंश जलमग्न हो गया था। इस घटना के पूर्व लंका की परिधि 5,120 मील थी और बाद में इसकी परिधि केवल 2,992 मील रह गई। महावंसा के द्वितीय शासक पांडुवा (जिन्होंने ईसा पूर्व 504 से 474 तक शासन किया) के काल में दुबारा श्रीलंका का कुछ क्षेत्र जलमग्न हो गया।इसके बाद श्रीलंका पर एक गंभीर विपत्ति देवानाम पिया तिस्सा और उसके सामंत केलनिया तिस्सा (ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी) के काल में आई। इसके फलस्वरूप लंका का आकार केवल 928 मील रह गया।















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आज़मगढ़

आज़मगढ़, शिबली कॉलेज के फाउंडर अल्लामा शिबली नोमानी का आज ही के दिन 18 नवम्बर 1914 को आज़मगढ़ में इंतेक़ाल हुआ। नोमानी अरबी उर्दू फारसी और तुर्की ज़ुबान के आलिम थे। आप ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम की ज़िंदगी पर "सीरत-उन-नबी" किताब लिखी थी। शिबली नोमानी इस किताब का दो चेप्टर ही लिख पाए थे बाकी के चेप्टर सैय्यद सुलेमान नदवी ने लिखा था। "सीरत-उन-नबी" किताब लिखने के सिलसिले में सीरिया तुर्की और इजिप्ट की यात्रा पर भी गए वहां सीरिया और वहां के बड़े आलिमों और मुफ़्ती शेख मुहम्मद अब्दुह से मिले उनकी मदद से अपनी किताब के लिए जानकारी इकट्ठा की। शिबली नोमानी के इस सफर का ख़र्चा भोपाल के नवाब बेग़म सुल्तान जहां ने फंड किया था। 1882 में वापस हिंदुस्तान लौटे तो सर सैय्यद अहमद खां ने उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में अरबी और फारसी पढ़ाने के लिए बुलाया। कई सालों तक अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ाया। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी छोड़ने के बाद हज़रत नोमानी ने हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी जॉइन कर ली। 1905 में हैदराबाद छोड़कर लखनऊ आ गए और यही नदवा यूनिवर्सिटी में प्रिंसिपल बन गए। हालांकि मुख़्...

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